ISRO ने गगनयान क्रू मॉड्यूल के पैराशूट का किया सफल परीक्षण, भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन की ओर एक और कदम
शियोपुर (मध्य प्रदेश) · 9 जुलाई 2026 · अपडेट किया गया
2.5 किलोमीटर की ऊँचाई पर उड़ रहे भारतीय वायुसेना के एक IL-76 विमान से एक डमी कैप्सूल हवा में छोड़ा गया। कुछ ही सेकंड में एक पैराशूट खुला, फैला, और उस भारी डमी को हवा में झुलाते हुए धीरे-धीरे नीचे उतारने लगा। ज़मीन पर मौजूद इसरो, DRDO, वायुसेना और थलसेना के इंजीनियर साँस रोके यह देख रहे थे — क्योंकि यह कोई सामान्य परीक्षण नहीं था। यह वही पैराशूट सिस्टम है जिस पर एक दिन भारत के अपने अंतरिक्ष यात्रियों की जान निर्भर करेगी।
7 जुलाई 2026 को मध्य प्रदेश के शियोपुर ज़िले में स्थित ADRDE (Aerial Delivery Research and Development Establishment) ड्रॉप ज़ोन में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने IMAT-05 — यानी Integrated Main Parachute Airdrop Test की पाँचवीं कड़ी — का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। इसरो ने बुधवार को अपने बयान में पुष्टि की कि परीक्षण ने सभी निर्धारित उद्देश्य पूरे किए, जिससे गगनयान के पहले मानव-रहित मिशन, G1, के लिए मुख्य पैराशूट प्रणाली पर भरोसा और मज़बूत हुआ है।
टेस्ट में क्या हुआ, ठीक-ठीक?
इस परीक्षण में एक मुख्य पैराशूट और एक डमी वज़न (dummy mass) की संयोजित असेंबली को भारतीय वायुसेना के IL-76 विमान से 2.5 किलोमीटर की ऊँचाई से गिराया गया। लक्ष्य था — अधिकतम अपेक्षित भार (maximum expected load) की स्थितियों में मुख्य पैराशूट की संरचनात्मक मज़बूती और डिज़ाइन सीमाओं (design margins) की जाँच करना, ताकि इसे G1 मिशन के लिए पूरी तरह प्रमाणित किया जा सके। परीक्षण के दौरान ड्रोग पैराशूट ने पहले मॉड्यूल को स्थिर किया और उसकी गति काफी हद तक घटाई, जिसके बाद मुख्य पैराशूट तैनात हुआ और पेलोड को एक सुरक्षित अंतिम गति तक धीमा कर दिया — ठीक वैसे ही जैसे यह असली मिशन में समुद्र में क्रू मॉड्यूल के सुरक्षित स्प्लैशडाउन के समय करेगा।
यह टेस्ट इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
अंतरिक्ष यान के बाकी हिस्सों के विपरीत, पैराशूट सिस्टम में गलती की कोई दूसरी संभावना नहीं होती। रॉकेट के किसी सेंसर में खराबी आने पर अक्सर बैकअप सिस्टम या ग्राउंड कंट्रोल हस्तक्षेप कर सकता है, लेकिन एक बार क्रू मॉड्यूल वायुमंडल में दोबारा प्रवेश कर चुका हो, तो पैराशूट का सही क्रम में, सही समय पर खुलना ही यात्रियों की सुरक्षा की आखिरी और एकमात्र गारंटी है। यही वजह है कि इसरो एक-दो नहीं, बल्कि पैराशूट प्रणाली के पाँच अलग-अलग एकीकृत ड्रॉप टेस्ट (IMAT सीरीज़) करवा रहा है, इसके अतिरिक्त रॉकेट-स्लेज और उच्च-ऊँचाई परीक्षण भी करवाए जा रहे हैं। नासा और रूस के अंतरिक्ष कार्यक्रमों ने भी अतीत में इसी चुनौती से जूझते हुए परीक्षण उपकरण खोए हैं — इसीलिए इसरो का यह अत्यंत सतर्क, चरणबद्ध तरीका किसी जल्दबाज़ी के बजाय दीर्घकालिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने का प्रतीक है।
गगनयान के 10 पैराशूट: पूरा सीक्वेंस समझिए
गगनयान क्रू मॉड्यूल की अवतरण प्रणाली (deceleration system) में कुल 10 पैराशूट हैं, जो चार अलग-अलग प्रकार के होते हैं और एक निश्चित क्रम में खुलते हैं:
| क्रम | पैराशूट प्रकार | संख्या | कार्य |
|---|---|---|---|
| 1 | एपेक्स कवर सेपरेशन पैराशूट | 2 | पैराशूट कम्पार्टमेंट के सुरक्षा कवर को अलग करते हैं |
| 2 | ड्रोग पैराशूट | 2 | मॉड्यूल को स्थिर करते हैं और शुरुआती गति घटाते हैं |
| 3 | पायलट पैराशूट | 3 | मुख्य पैराशूट को बाहर खींचकर तैनात करते हैं |
| 4 | मुख्य पैराशूट | 3 | मॉड्यूल को समुद्र में सुरक्षित स्प्लैशडाउन के लायक गति तक धीमा करते हैं |
7 जुलाई का परीक्षण विशेष रूप से इसी चौथे और सबसे महत्वपूर्ण चरण — मुख्य पैराशूट — को प्रमाणित करने के लिए था।
पाँचवाँ टेस्ट क्यों? पीछे का सफर
यह परीक्षण अचानक नहीं हुआ — यह वर्षों से चल रही एक सतर्क, चरणबद्ध प्रक्रिया की अगली कड़ी है। दिसंबर 2025 में, इसरो ने चंडीगढ़ स्थित TBRL (Terminal Ballistics Research Laboratory) की रेल-ट्रैक रॉकेट स्लेज सुविधा पर 600 किमी/घंटा से अधिक गति से पैराशूट के "डिस्रीफिंग" (disreefing, यानी पैराशूट के धीरे-धीरे पूरी तरह खुलने की प्रक्रिया) में किए गए बदलावों को परखा। इसके बाद फरवरी 2026 में DRDO और इसरो ने चंडीगढ़ में ही ड्रोग पैराशूट का अंतिम प्रमाणन-स्तरीय भार परीक्षण (final qualification level load test) पूरा किया, जिसमें अधिकतम उड़ान भार से भी अधिक भार देकर पैराशूट की अतिरिक्त सुरक्षा सीमा को परखा गया। 7 जुलाई का IMAT-05 इसी शृंखला में मुख्य पैराशूट के लिए पाँचवाँ और अब तक का सबसे निर्णायक परीक्षण था।
गगनयान मिशन: बड़ी तस्वीर
गगनयान भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन कार्यक्रम है, जिसकी सफलता भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बाद स्वतंत्र रूप से मनुष्यों को अंतरिक्ष में भेजने वाला चौथा देश बना देगी। कार्यक्रम की योजना के अनुसार पहले तीन मानव-रहित परीक्षण उड़ानें — G1, G2 और G3 — होंगी। G1 में कोई अंतरिक्ष यात्री नहीं, बल्कि इसरो द्वारा विकसित महिला-रूपी ह्यूमनॉइड रोबोट व्योममित्र (संस्कृत में "अंतरिक्ष-मित्र") उड़ान भरेगी, जो केबिन के तापमान, दबाव और वायु गुणवत्ता जैसे जीवन-सहायक प्रणालियों के आँकड़े एकत्र करेगी। G1 मूल रूप से मार्च 2026 के लिए लक्षित था, लेकिन पैराशूट और अबॉर्ट सिस्टम के सतर्क प्रमाणन के कारण अब यह 2026 की दूसरी छमाही में लॉन्च होने की उम्मीद है।
G1, G2 और G3 की सफलता के बाद, भारत का पहला मानव मिशन — H1 — 2027 में लॉन्च होने की योजना है, जिसमें तीन अंतरिक्ष यात्री लगभग एक सप्ताह तक पृथ्वी की निचली कक्षा (low Earth orbit) में रहेंगे। इसके लिए चार भारतीय वायुसेना टेस्ट पायलटों — ग्रुप कैप्टन प्रशांत बालकृष्णन नायर, ग्रुप कैप्टन अजीत कृष्णन, ग्रुप कैप्टन अंगद प्रताप, और विंग कमांडर शुभांशु शुक्ला — को फरवरी 2024 में "गगनयात्री" के रूप में चुना जा चुका है, और वे वर्षों से गहन प्रशिक्षण से गुज़र रहे हैं। पूरे कार्यक्रम का बजट, हाल ही में स्वीकृत विस्तार (भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के प्रारंभिक मॉड्यूल सहित) को मिलाकर, लगभग ₹20,193 करोड़ है।
आगे क्या होने वाला है?
पैराशूट प्रमाणन के समानांतर, इसरो एक और महत्वपूर्ण परीक्षण वाहन पर भी काम कर रहा है — SOLVE (Sub-Orbital Launch Vehicle for Experiments), जो PSLV के PSOM-XL बूस्टर पर आधारित एक विशेष रॉकेट है। इसका उद्देश्य है क्रू मॉड्यूल के एक डमी संस्करण को 10 से 17 किलोमीटर की ऊँचाई तक ले जाकर वहाँ से छोड़ना, ताकि पूरे अबॉर्ट और पैराशूट सीक्वेंस को उच्च-ऊँचाई की वास्तविक परिस्थितियों में परखा जा सके — यह लॉन्च अबॉर्ट सिस्टम के उपयोग के बिना किया जाने वाला परीक्षण है। आने वाले महीनों में इस तरह के और परीक्षणों के साथ-साथ, G1 मिशन की अंतिम तैयारियाँ भी तेज़ होंगी, जो गगनयान कार्यक्रम को भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन के और करीब ले जाएँगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
IMAT-05 टेस्ट कब और कहाँ हुआ?
यह परीक्षण 7 जुलाई 2026 को मध्य प्रदेश के शियोपुर ज़िले में स्थित ADRDE ड्रॉप ज़ोन में हुआ।
गगनयान क्रू मॉड्यूल में कुल कितने पैराशूट हैं?
कुल 10 पैराशूट, चार अलग-अलग प्रकार के: 2 एपेक्स कवर सेपरेशन, 2 ड्रोग, 3 पायलट, और 3 मुख्य पैराशूट।
गगनयान का पहला मानव-सहित मिशन कब लॉन्च होगा?
तीन मानव-रहित परीक्षण उड़ानों (G1, G2, G3) की सफलता के बाद, पहला मानव-सहित मिशन H1 वर्ष 2027 में लॉन्च होने की योजना है।
गगनयान के लिए अंतरिक्ष यात्री कौन हैं?
भारतीय वायुसेना के चार टेस्ट पायलट — ग्रुप कैप्टन प्रशांत बालकृष्णन नायर, ग्रुप कैप्टन अजीत कृष्णन, ग्रुप कैप्टन अंगद प्रताप, और विंग कमांडर शुभांशु शुक्ला — फरवरी 2024 में चुने गए थे।
निष्कर्ष में, 7 जुलाई का यह परीक्षण भले ही सुर्खियों में एक और "सफल टेस्ट" जैसा लगे, लेकिन इसके पीछे दशकों की मेहनत, हज़ारों घंटे की इंजीनियरिंग, और भारत के भावी अंतरिक्ष यात्रियों की जान की सुरक्षा को लेकर एक गहरी, धैर्यपूर्ण प्रतिबद्धता छिपी है। हर सफल पैराशूट ड्रॉप, भारत को उस पल के एक कदम और करीब ले जाता है जब एक भारतीय अपने ही देश की धरती से, अपने ही देश के रॉकेट पर सवार होकर अंतरिक्ष में जाएगा।
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