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विरुपाक्ष एईएसए रडार: भारतीय रक्षा प्रौद्योगिकी में एक तकनीकी मील का पत्थर



आधुनिक हवाई युद्ध और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) के इस दौर में, किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता उसकी उन्नत सर्विलांस और रडार प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भर करती है। भारत ने रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के नेतृत्व में स्वदेशी तकनीक के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व छलांग लगाई है। इसी दिशा में 'विरुपाक्ष एईएसए रडार' (Virupaksha AESA Radar) का विकास किया गया है। यह अत्याधुनिक एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैंड एरे (AESA) रडार प्रणाली भारतीय वायु सेना (IAF) की रीढ़ बनने जा रही है, विशेषकर इसे आगामी सुखोई Su-30MKI के आधुनिकीकरण कार्यक्रम (Super Sukhoi Program) और अन्य प्रमुख विमान प्लेटफार्मों के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह लेख विरुपाक्ष रडार की तकनीकी वास्तुकला, इसकी कार्यप्रणाली, DRDO के योगदान और भारतीय रक्षा परिदृश्य पर इसके व्यापक प्रभावों का गहन तकनीकी विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

1. विरुपाक्ष एईएसए रडार का परिचय और रणनीतिक पृष्ठभूमि

वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में, हवाई संप्रभुता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि शत्रु के विमानों, ड्रोनों और मिसाइलों को लंबी दूरी से ही डिटेक्ट और ट्रैक किया जा सके। पारंपरिक मकेनिकल रूप से घूमने वाले रडार (Mechanically Scanned Radars) अपनी भौतिक सीमाओं के कारण अब आधुनिक युद्धक्षेत्र की आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। इन सीमाओं से पार पाने के लिए, भारत ने 'विरुपाक्ष' नामक अत्याधुनिक एईएसए रडार प्रणाली विकसित की है। इस रडार का नाम भगवान शिव के एक स्वरूप 'विरुपाक्ष' के नाम पर रखा गया है, जो अपनी सर्वव्यापी दृष्टि के लिए जाने जाते हैं, और यह नाम इस रडार की क्षमताओं को पूरी तरह से चरितार्थ करता है।

विरुपाक्ष रडार को मुख्य रूप से भारतीय वायु सेना के फ्रन्टलाइन एयरक्राफ्ट्स के लिए तैयार किया गया है। आधुनिक हवाई संघर्षों में, दुश्मन के पास स्टील्थ (Stealth) विमान और उन्नत जैमिंग तकनीकें होती हैं। ऐसे में, पारंपरिक रडार आसानी से जाम हो जाते हैं या स्टील्थ लक्ष्यों को पकड़ने में विफल रहते हैं। विरुपाक्ष रडार अपनी उच्च शक्ति, मल्टी-मोड संचालन और जटिल एल्गोरिदम के माध्यम से इन चुनौतियों का डटकर मुकाबला करता है। यह एक साथ सैकड़ों लक्ष्यों को ट्रैक करने, उनकी पहचान करने और हथियारों को निर्देशित करने की क्षमता रखता है। इस प्रणाली का विकास भारतीय रक्षा क्षेत्र में अनुसंधान और विकास की बढ़ती हुई परिपक्वता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

इस रडार की परिकल्पना से लेकर इसके वास्तविक उत्पादन तक का सफर भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के अथक प्रयासों का परिणाम है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के इलेक्ट्रॉनिक्स और रडार विकास प्रतिष्ठान (LRDE) ने इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसे इस प्रकार से डिजाइन किया गया है कि यह न केवल भारतीय भौगोलिक परिस्थितियों (जैसे अत्यधिक तापमान और धूल भरी आंधी) में प्रभावी ढंग से काम कर सके, बल्कि यह उच्च ऊंचाई वाले युद्धक्षेत्रों में भी अपनी पूर्ण दक्षता बनाए रखे। वायु सेना की भविष्य की रणनीतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, विरुपाक्ष रडार को एक 'गेम-चेंजर' के रूप में देखा जा रहा है जो भारत की रक्षा क्षमताओं को एक नई ऊँचाई प्रदान करेगा।

इसके अतिरिक्त, विरुपाक्ष रडार का विकास 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' पहलों के अंतर्गत एक बहुत बड़ा मील का पत्थर है। अब तक भारत को अपनी रक्षा आवश्यकताओं के लिए विदेशी रडार प्रणालियों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे सामरिक संप्रभुता पर प्रश्नचिह्न लगता था और रखरखाव में भी भारी लागत आती थी। स्वदेशी रूप से विकसित विरुपाक्ष रडार न केवल लागत प्रभावी है, बल्कि यह सोर्स कोड और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के प्रतिबंधों से भी मुक्त है। इसका मतलब यह है कि भारतीय वैज्ञानिक अपनी आवश्यकतानुसार इसमें संशोधन और उन्नयन (Upgrades) कर सकते हैं, जो किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र की रक्षा तैयारियों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

2. एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैंड एरे (AESA) तकनीक की मूल वास्तुकला

विरुपाक्ष रडार की तकनीकी उत्कृष्टता का मूल आधार इसकी AESA (Active Electronically Scanned Array) तकनीक है। पारंपरिक रडार एक सिंगल हाई-पावर ट्रांसमीटर का उपयोग करते हैं और एंटीना को भौतिक रूप से घुमाकर अंतरिक्ष में स्कैन करते हैं। इसके विपरीत, AESA रडार में हजारों छोटे, ठोस-राज्य (Solid-State) ट्रांसमीटर/रिसीवर मॉड्यूल (TRMs) होते हैं, जो एक एंटीना फेस पर ग्रिड के रूप में व्यवस्थित होते हैं। प्रत्येक T/R मॉड्यूल अपनी खुद की रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) ऊर्जा उत्पन्न करता है और उसका प्रबंधन करता है।

गणितीय रूप से, यदि हम एक एरे एंटीना के बीम स्टीयरिंग को समझें, तो चरणबद्ध सरणी (Phased Array) में बीम का प्रकटन निम्नलिखित समीकरण द्वारा नियंत्रित होता है:

$$\theta = \sin^{-1} \left( \frac{\lambda \cdot \Delta \phi}{2 \pi d} \right)$$

यहाँ, $\theta$ बीम की दिशा को दर्शाता है, $\lambda$ प्रयुक्त तरंगदैर्ध्य (Wavelength) है, $\Delta \phi$ समीपवर्ती तत्वों के बीच का चरण अंतर (Phase Shift) है, और $d$ तत्वों के बीच की दूरी है। AESA तकनीक में इस चरण अंतर को इलेक्ट्रॉनिक रूप से माइक्रोसेकंड से भी कम समय में बदला जा सकता है। इसका परिणाम यह होता है कि रडार बीम बिना किसी भौतिक गति के अंतरिक्ष में बिजली की गति से एक बिंदु से दूसरे बिंदु पर स्थानांतरित हो सकती है।

इस वास्तुकला का सबसे बड़ा लाभ इसकी 'ग्र्रेसफुल डिग्रेडेशन' (Graceful Degradation) क्षमता है। पारंपरिक रडार में यदि मुख्य ट्रांसमीटर फेल हो जाए, तो पूरा रडार काम करना बंद कर देता है। हालांकि, विरुपाक्ष जैसे AESA रडार में हजारों T/R मॉड्यूल होते हैं। यदि इनमें से कुछ मॉड्यूल (मान लीजिए 5% या 10%) किसी कारणवश खराब भी हो जाते हैं, तो भी रडार अपनी कुल कार्यक्षमता के 90-95% हिस्से के साथ सुचारू रूप से काम करता रहता है। यह युद्ध की स्थिति में अत्यधिक उच्च विश्वसनीयता (High Reliability) सुनिश्चित करता है, जहाँ मिशन की विफलता का कोई स्थान नहीं होता है।

इसके अलावा, AESA वास्तुकला रडार को मल्टी-फंक्शनल बनाती है। यह एक ही समय में कई अलग-अलग कार्य कर सकता है, जैसे- एक ही समय में हवा में लक्ष्यों की तलाश करना (Air Search), जमीन पर लक्ष्यों को ट्रैक करना (Ground Mapping), इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-कौंटरमेजर्स (ECCM) निष्पादित करना और मिसाइलों को मार्गदर्शन प्रदान करना। यह क्षमता पारंपरिक रडार में असंभव थी, क्योंकि उन्हें अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग समय स्लॉट या अलग-अलग रडार की आवश्यकता होती थी। विरुपाक्ष रडार की यह बहु-कार्यात्मक प्रकृति पायलट के कार्यभार को काफी हद तक कम करती है और युद्ध के मैदान में सामरिक प्रतिक्रिया समय को न्यूनतम करती है।

3. DRDO और भारतीय रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता

रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने पिछले कुछ दशकों में देश को रक्षा प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। विरुपाक्ष एईएसए रडार का विकास इसी विजन का एक चमकदार उदाहरण है। LRDE (Electronics and Radar Development Establishment), जो DRDO की एक प्रमुख प्रयोगशाला है, ने इस रडार के डिजाइन, विकास और एकीकरण का बीड़ा उठाया। इस परियोजना ने देश के भीतर उन्नत अर्धचालक (Semiconductor) प्रौद्योगिकी, मिलीमीटर-वेव (mmWave) घटकों और उच्च गति डिजिटल सिग्नल प्रोसेसिंग के विकास को गति दी है।

AESA रडार का निर्माण करना दुनिया के चुनिंदा देशों (जैसे अमेरिका, रूस, इजराइल, फ्रांस और चीन) के पास ही तकनीकी क्षमता है। इन देशों ने इस तकनीक को दशकों के शोध और अरबों डॉलर के निवेश के बाद हासिल किया है। DRDO के वैज्ञानिकों ने गॉलियम आर्सेनाइड (GaAs) और गैलियम नाइट्राइड (GaN) आधारित सॉलिड-राज्य घटकों के स्वदेशी विकास पर जोर दिया है। GaN तकनीक विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पारंपरिक GaAs की तुलना में उच्च शक्ति घनत्व (High Power Density), बेहतर थर्मल दक्षता और व्यापक बैंडविड्थ प्रदान करती है, जिससे विरुपाक्ष रडार की रेंज और संवेदनशीलता कई गुना बढ़ जाती है।

स्वदेशी रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में DRDO की यह उपलब्धि निजी उद्योगों (Public-Private Partnership) के सहयोग के बिना अधूरी होती। विरुपाक्ष रडार के विकास में कई भारतीय सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की कंपनियों ने घटक निर्माण और उप-प्रणालियों (Sub-systems) के विकास में योगदान दिया है। इससे देश में एक मजबूत रक्षा विनिर्माण इकोसिस्टम का निर्माण हुआ है। तकनीकी जटिलताओं को पार करते हुए, भारतीय वैज्ञानिकों ने सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रडार आर्किटेक्चर को लागू किया है, जिसका अर्थ है कि रडार की अधिकांश क्षमताओं को हार्डवेयर बदलने के बजाय केवल सॉफ्टवेयर अपडेट के माध्यम से उन्नत किया जा सकता है।

यह आत्मनिर्भरता केवल लागत बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से एक अत्यंत आवश्यक कदम है। विदेशी रडार प्रणालियों में 'किल स्विच' या गुप्त सॉलिड-राज्य बैकडोर का हमेशा डर बना रहता है, जिसके माध्यम से आपूर्तिकर्ता देश रडार को अक्षम कर सकता है। पूर्णतः स्वदेशी होने के कारण विरुपाक्ष रडार इन सभी सामरिकVulnerabilities से मुक्त है। इसके अलावा, भविष्य में यदि भारत को इस रडार को निर्यात (Export) करना हो, तो हमें किसी अन्य देश की अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे भारत के रक्षा निर्यात लक्ष्यों को भी एक नई दिशा मिलेगी।

4. उन्नत तकनीकी विशेषताएं और सिग्नल प्रोसेसिंग

विरुपाक्ष रडार अपनी उन्नत सिग्नल प्रोसेसिंग और अत्याधुनिक तकनीकी विशेषताओं के कारण दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू रडार के समकक्ष खड़ा है। रडार की प्रभावशीलता केवल उसके ट्रांसमीटर की शक्ति पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि वह प्राप्त होने वाले सिग्नल (Return Echoes) को शोर (Noise) और क्लटर (Clutter) के बीच से कितनी सटीकता से अलग कर पाता है। विरुपाक्ष में उन्नत डिजिटल सिग्नल प्रोसेसर्स (DSPs) और फेन-आउट एल्गोरिदम का उपयोग किया गया है जो वास्तविक समय में भारी मात्रा में डेटा का विश्लेषण करते हैं।

इस रडार की मुख्य तकनीकी विशेषताओं में लो-प्रोबेबिलिटी ऑफ इंटरसेप्ट (LPI) और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-कौंटरमेजर्स (ECCM) शामिल हैं। LPI तकनीक के माध्यम से, विरुपाक्ष ऐसी तरंगों (Waveforms) का उत्सर्जन करता है जो दुश्मन के रडार वार्निंग रिसीवर्स (RWR) द्वारा आसानी से पकड़ी नहीं जाती हैं। इसका अर्थ यह है कि भारतीय विमान दुश्मन को बिना यह बताए कि उसे ट्रैक किया जा रहा है, उसकी निगरानी कर सकते हैं और आश्चर्यजनक हमला कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, दुश्मन द्वारा दागे गए जैमर सिग्नल्स का मुकाबला करने के लिए यह रडार तुरंत अपनी ऑपरेटिंग फ्रीक्वेंसी बदल सकता है (Frequency Hopping), जिससे जैमिंग प्रभावहीन हो जाती है।

रडार की डिटेक्शन रेंज और रिज़ॉल्यूशन को समझने के लिए निम्नलिखित रडार समीकरण का अध्ययन किया जा सकता है:

$$R^4 = \frac{P_t \cdot G^2 \cdot \lambda^2 \cdot \sigma}{(4\pi)^3 \cdot P_{min}}$$

जहाँ $R$ अधिकतम रेंज है, $P_t$ प्रेषित शक्ति है, $G$ एंटीना लाभ (Gain) है, $\lambda$ तरंगदैर्ध्य है, $\sigma$ रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) है, और $P_{min}$ न्यूनतम प्राप्त शक्ति है। विरुपाक्ष रडार में कई T/R मॉड्यूल होने के कारण इसका कुल प्रभावी एंटीना लाभ ($G$) बहुत अधिक होता है, और यह छोटे से छोटे रडार क्रॉस-सेक्शन (जैसे छोटे स्टील्थ ड्रोन या क्रूज मिसाइल) को भी अत्यधिक दूरी से डिटेक्ट करने में सक्षम है।

इसके अलावा, विरुपाक्ष रडार में सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) और ग्राउंड मूविंग टारगेट इंडिकेशन (GMTI) मोड भी शामिल हैं। SAR मोड के माध्यम से, यह रडार प्रतिकूल मौसम या घने अंधेरे में भी जमीन की अत्यंत उच्च-प्रतिकृति (High-Resolution) छवियां उत्पन्न कर सकता है, जिससे सामरिक लक्ष्यों की पहचान करना आसान हो जाता है। GMTI मोड जमीन पर चल रहे वाहनों या सैनिकों की गतिविधियों को ट्रैक करने में मदद करता है। यह समग्र तकनीकी पैकेज विरुपाक्ष को एक बहुआयामी और दुर्भावनापूर्ण हवाई खतरों से निपटने वाला अत्यंत सक्षम यंत्र बनाता है।

5. भारतीय वायु सेना और Su-30MKI एकीकरण पर प्रभाव

भारतीय वायु सेना के बेड़े में सुखोई Su-30MKI एक प्रमुख भारी लड़ाकू विमान है, जो वर्तमान में वायु सेना की युद्धक क्षमता का केंद्र बिंदु है। हालांकि, Su-30MKI में मूल रूप से रूसी 'Bars' PESA (Passive Electronically Scanned Array) रडार का उपयोग किया जाता है, जो अपनी पीढ़ी का बेहतरीन रडार होते हुए भी अब आधुनिक युद्ध की आवश्यकताओं के मुकाबले पुराना पड़ रहा है। वायु सेना के 'सुपर सुखोई' आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत, भारत ने अपने Su-30MKI बेड़े में स्वदेशी एईएसए रडार को एकीकृत करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है, और इस भूमिका के लिए 'विरुपाक्ष' सबसे प्रमुख दावेदार और चयनित प्रणाली है।

सुखोई Su-30MKI के नोज़ कोन (Nose Cone) में विरुपाक्ष रडार के एकीकरण से विमान की मारक क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव आएगा। वर्तमान में, Su-30MKI को दुश्मन के विमानों को लॉक करने के लिए एक समय में सीमित क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करना पड़ता है। विरुपाक्ष रडार के लगने के बाद, यह विमान एक ही समय में हवा से हवा में मार करने वाली लंबी दूरी की मिसाइलों (जैसे अस्त्र मिसाइल) को कई लक्ष्यों की ओर निर्देशित कर सकेगा। इसके साथ ही, यह भारतीय पायलटों को बियॉन्ड विजुअल रेंज (BVR) कॉम्बैट में भारी सामरिक बढ़त प्रदान करेगा, जिससे वे दुश्मन को उसकी सीमा में ही निशाना बना सकेंगे।

इस एकीकरण की प्रक्रिया तकनीकी रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। रूसी मूल के विमान के एवियोनिक्स, मिशन कंप्यूटर और डेटा बसों (जैसे MIL-STD-1553 और Ethernet) के साथ स्वदेशी रडार को सिंक करना एक जटिल कार्य है। DRDO और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने मिलकर इसके सफल एकीकरण के लिए विशेष सॉफ्टवेयर इंटरफेस विकसित किए हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय रक्षा उद्योग अब विदेशी और स्वदेशी प्रणालियों के बीच एक सहज तालमेल बिठाने में पूरी तरह सक्षम हो चुका है।

रणनीतिक दृष्टिकोण से, यह एकीकरण भारतीय वायु सेना की ऑपरेशनल रेडिनेस को कई गुना बढ़ा देगा। यदि भविष्य में सीमा पर किसी भी प्रकार का द्वंद होता है, तो विरुपाक्ष युक्त सुखोई विमान दुश्मन के एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (AWACS) और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर विमानों को लंबी दूरी से ही चिन्हित कर उन्हें नष्ट करने में सक्षम होंगे। यह पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में वायु शक्ति के संतुलन को भारत के पक्ष में मजबूती से झुका देगा और किसी भी दुस्साहस के खिलाफ एक अचूक निवारक (Deterrent) के रूप में कार्य करेगा।

6. निष्कर्ष और भविष्य की दिशा

संक्षेप में कहें तो, विरुपाक्ष एईएसए रडार केवल एक सैन्य उपकरण मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत की वैज्ञानिक क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक है। DRDO के नेतृत्व में विकसित इस अत्याधुनिक रडार प्रणाली ने यह साबित कर दिया है कि भारत अब जटिल और उच्च तकनीक वाले रक्षा उपकरणों को डिजाइन और निर्मित करने में पूरी तरह सक्षम है। एईएसए तकनीक की मूल वास्तुकला, उन्नत सिग्नल प्रोसेसिंग, उच्च विश्वसनीयता और मल्टी-फंक्शनल क्षमताएं इसे वैश्विक स्तर पर सर्वश्रेष्ठ रडार प्रणालियों की पंक्ति में रखती हैं।

सुखोई Su-30MKI विमानों में विरुपाक्ष रडार का एकीकरण भारतीय वायु सेना की मारक क्षमता को एक नई दिशा और धार देगा। यह न केवल हमारी सीमाओं की रक्षा को अचूक बनाएगा, बल्कि भविष्य के हवाई युद्धों में भारत को एक रणनीतिक बढ़त भी प्रदान करेगा। जैसे-जैसे इस रडार का बड़े पैमाने पर उत्पादन और अन्य विमानों (जैसे LCA Tejas Mk2 या AMCA के प्रारंभिक संस्करणों) में इसका अनुकूलन होगा, भारत वैश्विक रक्षा बाजार में एक प्रमुख निर्यातक के रूप में भी उभर सकता है। विरुपाक्ष रडार का सफल विकास 'आत्मनिर्भर भारत' के सपने को वास्तविक धरातल पर उतारने का एक जीवंत और प्रेरणादायक उदाहरण है।

मुख्य बिंदु (Key Points)

  • विकास एजेंसी: डीआरडीओ (DRDO) के इलेक्ट्रॉनिक्स और रडार विकास प्रतिष्ठान (LRDE) द्वारा विकसित।
  • तकनीक: एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैंड एरे (AESA) तकनीक जिसपर ठोस-राज्य T/R मॉड्यूल आधारित हैं।
  • प्रमुख मंच: भारतीय वायु सेना के सुखोई Su-30MKI आधुनिकीकरण (Super Sukhoi) कार्यक्रम के लिए मुख्य रूप से चयनित।
  • मुख्य विशेषताएं: कम रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) लक्ष्यों का पता लगाना, LPI (Low Probability of Intercept), और मजबूत ECCM क्षमताएं।
  • रणनीतिक महत्व: विदेशी निर्भरता को समाप्त करना और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. विरुपाक्ष एईएसए रडार क्या है और इसे किसने विकसित किया है?

विरुपाक्ष एक अत्याधुनिक एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैंड एरे (AESA) रडार है, जिसे भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) की प्रमुख प्रयोगशाला LRDE द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित किया गया है।

2. विरुपाक्ष रडार का उपयोग मुख्य रूप से किस विमान में किया जाएगा?

इस रडार को मुख्य रूप से भारतीय वायु सेना के सुखोई Su-30MKI लड़ाकू विमानों के 'सुपर सुखोई' आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत उनके नोज़ कोन में एकीकृत करने के लिए चुना गया है।

3. AESA रडार पारंपरिक रडार से किस प्रकार बेहतर है?

AESA रडार में हजारों छोटे ट्रांसमीटर/रिसीवर मॉड्यूल होते हैं जो इलेक्ट्रॉनिक रूप से बीम को नियंत्रित करते हैं। इसमें कोई भौतिक गति नहीं होती, यह एक साथ कई कार्य कर सकता है और यदि कुछ मॉड्यूल खराब भी हो जाएं तो भी यह काम करता रहता है।

4. भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए विरुपाक्ष रडार क्यों महत्वपूर्ण है?

यह रडार भारत की विदेशी रक्षा उपकरणों पर निर्भरता को समाप्त करता है, 'आत्मनिर्भर भारत' को बढ़ावा देता है और भारतीय वायु सेना को उन्नत हवाई युद्ध में तकनीकी श्रेष्ठता प्रदान करता है।

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