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शुभांशु शुक्ला: ISS पहुँचने वाले पहले भारतीय की कहानी

 

शुभांशु शुक्ला: कारगिल के एक 14 साल के लड़के से भारत के दूसरे अंतरिक्ष यात्री तक का सफर

अंतिम बार अपडेट किया गया: 10 जुलाई 2026

1984 में राकेश शर्मा के बाद, 41 साल तक कोई भारतीय दोबारा अंतरिक्ष में नहीं गया था। फिर 25 जून 2025 को, लखनऊ के एक लड़के ने, जिसने कभी अपने परिवार को अपनी परीक्षा तक की खबर नहीं होने दी थी, फ्लोरिडा से एक स्पेसक्राफ्ट में सवार होकर उस अंतराल को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। यह कहानी है ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की — भारतीय वायुसेना के एक टेस्ट पायलट से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) में कदम रखने वाले पहले भारतीय बनने तक का सफर।

सुभानसु शुक्ला

विषय-सूची

कारगिल का वह लड़का जिसने वर्दी पहनने की ठानी

शुभांशु शुक्ला का जन्म 10 अक्टूबर 1985 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ। 1999 में जब कारगिल युद्ध छिड़ा, तब शुभांशु महज़ 14 साल के थे — लेकिन उस युद्ध की खबरों ने उनके भीतर देश की सेवा करने की गहरी इच्छा जगा दी। उन्होंने बिना परिवार को बताए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) परीक्षा के लिए आवेदन कर दिया — यहाँ तक कि परीक्षा देने के लिए वे अपनी ही बहन की विदाई की रस्म बीच में छोड़कर निकल गए थे। यह परीक्षा पास करना उनके सैन्य करियर की असली शुरुआत बनी। एनडीए से उन्होंने कंप्यूटर साइंस में स्नातक (BSc) की डिग्री 2005 में पूरी की।

आसमान में करियर: फाइटर पायलट से टेस्ट पायलट तक

जून 2006 में शुभांशु भारतीय वायुसेना की फाइटर स्ट्रीम में कमीशन हुए। अगले वर्षों में उन्होंने एक कॉम्बैट लीडर और अनुभवी टेस्ट पायलट के रूप में अपनी पहचान बनाई, और Su-30 MKI, MiG-21, MiG-29, जगुआर, हॉक, डोर्नियर और An-32 सहित कई तरह के विमानों पर 2,000 घंटे से अधिक की उड़ान का अनुभव हासिल किया। मार्च 2024 में वे ग्रुप कैप्टन के पद पर पदोन्नत हुए — यह उनके करियर की असाधारण उपलब्धियों का प्रमाण था।

2019 की वह कॉल जिसने ज़िंदगी बदल दी

2019 में, इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसिन (IAM) ने शुभांशु को भारत के महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम, गगनयान, के लिए चुना। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने इस आवेदन की खबर भी अपने परिवार से तब तक छुपाए रखी, जब तक बात पक्की नहीं हो गई — यह उनकी आत्मनिर्भर और निजी स्वभाव की एक और झलक थी, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने वर्षों पहले NDA परीक्षा के समय किया था। चयन के बाद उन्होंने रूस के स्टार सिटी स्थित यूरी गागरिन कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर में एक साल का कठिन बुनियादी अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण पूरा किया (2021 में समाप्त), और फिर बेंगलुरु स्थित इसरो के एस्ट्रोनॉट ट्रेनिंग फैसिलिटी में मिशन-विशिष्ट प्रशिक्षण लिया। इसी दौरान उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बेंगलुरु से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में M.Tech की डिग्री भी पूरी की। 27 फरवरी 2024 को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं शुभांशु शुक्ला को गगनयान मिशन के लिए चुने गए चार अंतरिक्ष यात्रियों में से एक के रूप में सार्वजनिक रूप से घोषित किया।

एक्सिओम-4: 41 साल बाद भारत की अंतरिक्ष में वापसी

गगनयान की तैयारी के समानांतर, शुभांशु को एक और ऐतिहासिक अवसर मिला — एक्सिओम मिशन-4 (Ax-4) के पायलट के रूप में उड़ान भरने का, जो NASA, इसरो और निजी अमेरिकी कंपनी एक्सिओम स्पेस के संयुक्त प्रयास से आयोजित एक वाणिज्यिक अंतरिक्ष मिशन था। चार सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय क्रू में कमांडर पैगी व्हिटसन (अमेरिका), पायलट शुभांशु शुक्ला (भारत), और पोलैंड व हंगरी के मिशन विशेषज्ञ शामिल थे — यह टीम इन तीनों देशों की दशकों बाद मानव अंतरिक्ष उड़ान में वापसी का प्रतीक थी।

25 जून 2025 को, यह मिशन नासा के केनेडी स्पेस सेंटर से स्पेसएक्स के ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट "ग्रेस" पर सवार होकर रवाना हुआ, और लगभग 16 घंटे बाद ISS से डॉक हुआ। इस उड़ान के साथ ही शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष में जाने वाले 634वें इंसान और कार्मन रेखा (अंतरिक्ष की सीमा) पार करने वाले दूसरे भारतीय बन गए — 1984 में राकेश शर्मा के बाद पहली बार। लेकिन एक बड़ा फर्क था: राकेश शर्मा के समय ISS का अस्तित्व ही नहीं था (इसकी स्थापना 1998 में हुई), इसलिए शुभांशु शुक्ला वास्तव में इस अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में कदम रखने वाले पहले भारतीय बने।

स्पेस स्टेशन पर 18 दिन

मूल रूप से 14 दिनों के लिए नियोजित यह वैज्ञानिक मिशन बढ़कर 18 दिनों का हो गया। इस दौरान क्रू ने लगभग 60 प्रयोग किए, जिनमें से कम-से-कम सात प्रयोग खासतौर पर इसरो द्वारा डिज़ाइन किए गए थे — जिनमें अंतरिक्ष में पोषण और जीवन-सहायक प्रणालियों से जुड़े भारत-केंद्रित अध्ययन शामिल थे। पूरे मिशन के दौरान क्रू ने पृथ्वी की लगभग 282 परिक्रमाएँ पूरी कीं और करीब 1.2 करोड़ किलोमीटर की दूरी तय की।

मिशन के भावुक हिस्सों में से एक तब आया जब क्रू को ISS के कपोला (अवलोकन मॉड्यूल) में ले जाकर आँखें बंद करने को कहा गया, और फिर अचानक खोलने पर सामने पृथ्वी की विशाल, नीली छवि उभर आई — शुभांशु ने बाद में इसे अपने जीवन के सबसे गहरे अनुभवों में से एक बताया। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी भारतीयता झलकती रही: भारहीनता में स्वाद-ग्रंथियाँ सुस्त पड़ने से खाने का स्वाद पहले जैसा नहीं लगता, और जब उनकी पसंद का खास भारतीय भोजन किट समय पर स्टेशन तक नहीं पहुँच पाया, तो उन्होंने मानक अंतरिक्ष-भोजन में श्रीराचा सॉस मिलाकर काम चलाया। परिवार से दूरी भी महसूस हुई — उड़ान से पहले अपने माता-पिता को किए गए फोन में उन्होंने बस इतना कहा था कि वे लौटकर ज़रूर आएँगे, बस उनका इंतज़ार करें। स्टेशन से उन्होंने भारत के स्कूली छात्रों से भी सीधे बातचीत की, जिनसे उन्होंने कहा कि उनमें से कई आने वाले समय के अंतरिक्ष यात्री बन सकते हैं।

धरती पर वापसी और सम्मान

मिशन से सुरक्षित वापसी के बाद, भारत सरकार ने शुभांशु शुक्ला की उपलब्धि को व्यापक रूप से मान्यता दी। जनवरी 2026 के गणतंत्र दिवस सम्मान समारोह में उन्हें अशोक चक्र — भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन सैन्य सम्मान — प्रदान किया गया। मई 2026 में, अंतरराष्ट्रीय संगठन कार्मन प्रोजेक्ट ने भी उन्हें अपने 2026 के फेलो के रूप में नामित किया। भारत सरकार ने इस एक सीट के लिए अनुमानित रूप से लगभग ₹548 करोड़ (करीब 5.7 करोड़ डॉलर) खर्च किए — एक राशि जिसे इसरो अधिकारियों ने भविष्य के गगनयान मिशन के लिए मिले व्यावहारिक अनुभव और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की जानकारी को देखते हुए पूरी तरह उचित बताया।

यह मिशन गगनयान के लिए क्यों मायने रखता है

एक्सिओम-4 केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी — यह इसरो के लिए एक रणनीतिक निवेश भी थी। शुभांशु शुक्ला, जो खुद गगनयान के लिए चुने गए चार अंतरिक्ष यात्रियों में से एक हैं, को इस मिशन के ज़रिए वास्तविक स्पेसक्राफ्ट संचालन, डॉकिंग प्रक्रिया, भारहीनता में जीवन, और अंतरराष्ट्रीय स्टेशन के जीवन-सहायक तंत्रों का प्रत्यक्ष अनुभव मिला — ऐसा अनुभव जो केवल ज़मीन पर सिमुलेटर में हासिल करना संभव नहीं। यह ठीक उसी व्यापक तैयारी की एक कड़ी है जिसका एक हिस्सा हाल ही में सफल हुआ गगनयान क्रू मॉड्यूल का पैराशूट परीक्षण (IMAT-05) भी है। गगनयान का लक्ष्य है — तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पूरी तरह स्वदेशी रॉकेट और स्पेसक्राफ्ट के ज़रिए निचली पृथ्वी कक्षा में भेजना और सुरक्षित वापस लाना — और शुभांशु का यह अनुभव इस लक्ष्य को कहीं अधिक भरोसेमंद बनाता है।

"द सेकंड ऑर्बिट": अपनी कहानी, अपनी ज़ुबानी

अपने मिशन की पहली वर्षगांठ पर, 25 जून 2026 को, शुभांशु शुक्ला ने अपनी पहली किताब — The Second Orbit: Belief of a Man… Dream of 1.4 Billion Hearts — प्रकाशित की। इस संस्मरण में वे अपने प्रशिक्षण, मिशन के अनुभवों, और परिवार से दूर रहकर एक असंभव-सा दिखने वाला सपना पूरा करने की भावनात्मक यात्रा को साझा करते हैं। यह किताब न केवल उनकी निजी कहानी है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए एक संदेश भी है कि अंतरिक्ष में जाने का सपना अब केवल कुछ चुनिंदा देशों तक सीमित नहीं रहा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शुभांशु शुक्ला ISS पर जाने वाले पहले भारतीय क्यों माने जाते हैं, जबकि राकेश शर्मा पहले ही अंतरिक्ष जा चुके थे?

राकेश शर्मा 1984 में सोवियत सैल्यूट-7 स्टेशन पर गए थे। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की स्थापना 1998 में हुई, इसलिए शुभांशु शुक्ला इस विशिष्ट स्टेशन में कदम रखने वाले पहले भारतीय हैं, जबकि अंतरिक्ष में जाने वाले वे दूसरे भारतीय हैं।

एक्सिओम-4 मिशन कितने दिनों का था?

मूल योजना 14 दिनों की थी, लेकिन यह मिशन बढ़कर 18 दिनों का हो गया।

क्या एक्सिओम-4 गगनयान मिशन का हिस्सा था?

नहीं, यह एक अलग वाणिज्यिक मिशन था, लेकिन इससे मिला अनुभव सीधे गगनयान की तैयारियों में मदद कर रहा है, क्योंकि शुभांशु शुक्ला स्वयं गगनयान के लिए चयनित अंतरिक्ष यात्री हैं।

शुभांशु शुक्ला को कौन सा सम्मान मिला?

जनवरी 2026 में उन्हें भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन सैन्य सम्मान, अशोक चक्र, प्रदान किया गया।

निष्कर्ष में, शुभांशु शुक्ला की कहानी सिर्फ एक अंतरिक्ष मिशन की कहानी नहीं है — यह एक 14 साल के लड़के के दृढ़ संकल्प, वर्षों के अनुशासन, और एक राष्ट्र की उम्मीदों को अपने कंधों पर उठाकर अंतरिक्ष तक पहुँचाने की कहानी है। और यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ — गगनयान के ज़रिए, भारत की अपनी धरती से, अपने ही रॉकेट पर, अपने अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने का सपना अब पहले से कहीं ज़्यादा करीब है।

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