आकाशगंगाओं में छिपे "शांत" सुपरमैसिव ब्लैक होल: नई खोज ने बदली समझ
अंतिम बार अपडेट किया गया: 11 जुलाई 2026
कल्पना कीजिए कि आपके पड़ोस में सैकड़ों घर हैं, और आप जानते हैं कि लगभग हर घर में कोई-न-कोई रहता ज़रूर है — लेकिन एक-चौथाई घरों की बत्तियाँ इतनी धीमी हैं कि बाहर से देखने पर वे खाली लगते हैं। अब कल्पना कीजिए कि "घर" असल में पूरी की पूरी आकाशगंगाएँ हैं, और उनके अंदर "रहने वाला" कोई और नहीं बल्कि एक सुपरमैसिव ब्लैक होल है। बिल्कुल यही तस्वीर वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने — जिसमें भारत के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिज़िक्स (IIA) की डॉ. अरु बेरी भी शामिल थीं — हाल ही में उजागर की है। रेडियो तरंगों की मदद से उन्होंने 280 आस-पास की आकाशगंगाओं में से लगभग एक-चौथाई के केंद्र में ऐसे ब्लैक होल खोज निकाले, जो अब तक हमारी नज़रों से पूरी तरह छिपे हुए थे।
विषय-सूची
- सुपरमैसिव ब्लैक होल "शांत" क्यों होते हैं?
- e-MERLIN: सात टेलीस्कोप, एक विशाल आँख
- खोज: हर चौथी आकाशगंगा में एक छिपा राज़
- पारसेक-स्केल रिज़ॉल्यूशन: फर्क करने की असली कुंजी
- जेट और आउटफ्लो: शांत ब्लैक होल भी आकाशगंगाओं को गढ़ते हैं
- भारत की भूमिका: डॉ. अरु बेरी और IIA
- यह खोज क्यों मायने रखती है
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सुपरमैसिव ब्लैक होल "शांत" क्यों होते हैं?
खगोलविदों का मानना है कि लगभग हर बड़ी आकाशगंगा — जिसमें हमारी अपनी मिल्की वे भी शामिल है — के केंद्र में एक सुपरमैसिव ब्लैक होल मौजूद है, जिसका द्रव्यमान सूर्य से लाखों-अरबों गुना अधिक हो सकता है। जब ऐसा ब्लैक होल आसपास की गैस और धूल को तेज़ी से "खा" रहा होता है (इस प्रक्रिया को अभिवृद्धि/accretion कहते हैं), तो वह अत्यंत चमकीला बन जाता है — इसे क्वासर (quasar) या सक्रिय गैलेक्टिक न्यूक्लियस (AGN) कहा जाता है, जो पूरी आकाशगंगा से भी अधिक चमक सकता है। लेकिन अधिकांश ब्लैक होल इतनी धीमी गति से पदार्थ ग्रहण करते हैं कि वे बेहद फीके रह जाते हैं — पारंपरिक दूरबीनों के लिए लगभग अदृश्य। यही वे "शांत" या कमज़ोर रूप से सक्रिय ब्लैक होल हैं, जिनकी खोज अब तक विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती रही है।
e-MERLIN: सात टेलीस्कोप, एक विशाल आँख
इस खोज को संभव बनाने वाला उपकरण है e-MERLIN — यूनाइटेड किंगडम में फैले सात रेडियो टेलीस्कोप का एक नेटवर्क, जो आपस में जुड़कर एक विशाल, अत्यंत उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले "इंटरफेरोमीटर" के रूप में काम करता है। इसका सिद्धांत सरल लेकिन दमदार है: कई अलग-अलग जगहों पर रखे छोटे टेलीस्कोप, जब एक साथ एक ही वस्तु को देखते हैं, तो वे मिलकर एक ऐसे विशालकाय टेलीस्कोप जितनी बारीकी से देख सकते हैं जितना अकेला कोई भी उपकरण नहीं देख सकता। शोधकर्ताओं ने इस नेटवर्क का उपयोग Palomar सैंपल से चुनी गई 280 आस-पास की आकाशगंगाओं के केंद्रीय क्षेत्रों को बेहद बारीकी से जाँचने के लिए किया।
खोज: हर चौथी आकाशगंगा में एक छिपा राज़
नतीजे चौंकाने वाले थे। अध्ययन की गई लगभग एक-चौथाई (25%) आकाशगंगाओं के बिल्कुल केंद्र से, वैज्ञानिकों ने सघन (compact) रेडियो उत्सर्जन का पता लगाया — यानी वहाँ ऐसे सुपरमैसिव ब्लैक होल मौजूद हैं जो धीरे-धीरे पदार्थ ग्रहण कर रहे हैं, लेकिन इतनी फीकी रोशनी में कि परंपरागत तरीकों से वे पूरी तरह छूट जाते। कुछ मामलों में तो केंद्र से कई पारसेक (parsec) दूर तक फैली जेट-जैसी रेडियो संरचनाएँ भी दिखीं — यानी ये ब्लैक होल न सिर्फ मौजूद हैं, बल्कि सक्रिय रूप से अपने आसपास के वातावरण को भी प्रभावित कर रहे हैं। यह अध्ययन Monthly Notices of the Royal Astronomical Society (MNRAS) पत्रिका में प्रकाशित हुआ, और इसका नेतृत्व डी.आर.ए. विलियम्स-बाल्डविन ने किया।
पारसेक-स्केल रिज़ॉल्यूशन: फर्क करने की असली कुंजी
किसी आकाशगंगा के केंद्र में सिर्फ रेडियो सिग्नल मिल जाना काफी नहीं — असली चुनौती यह पहचानना है कि वह सिग्नल ब्लैक होल से आ रहा है या केंद्र के आसपास मौजूद तारों की सामान्य गतिविधियों (जैसे सुपरनोवा विस्फोट) से। यहीं पारसेक-स्केल रिज़ॉल्यूशन (यानी प्रकाश-वर्षों नहीं, बल्कि सिर्फ कुछ पारसेक जितनी बारीकी से देखने की क्षमता) काम आती है। e-MERLIN जैसी उच्च-रिज़ॉल्यूशन प्रणाली से वैज्ञानिक आकाशगंगा के केंद्र के ठीक उसी एक बिंदु को अलग से देख पाए, जहाँ से सिग्नल आ रहा था — यही तकनीकी बढ़त थी जिसने पहली बार इतने बड़े पैमाने पर, सांख्यिकीय रूप से पूर्ण सर्वे को संभव बनाया।
जेट और आउटफ्लो: शांत ब्लैक होल भी आकाशगंगाओं को गढ़ते हैं
यह मान लेना आसान है कि "शांत" यानी "बेअसर" — लेकिन यह खोज बताती है कि यह धारणा गलत है। ये फीके, कम-सक्रिय ब्लैक होल भी अपने आसपास जेट और ऊर्जा-प्रवाह (outflows) के ज़रिए भारी मात्रा में ऊर्जा छोड़ते रहते हैं। यह ऊर्जा आकाशगंगा में मौजूद गैस को गर्म कर सकती है या उसे बाहर धकेल सकती है, जिससे नए तारों के बनने की दर सीधे प्रभावित होती है। दूसरे शब्दों में, आकाशगंगा के केंद्र में बैठा एक "खामोश" ब्लैक होल भी, लंबे समय में, पूरी आकाशगंगा के भविष्य को आकार देने में उतनी ही अहम भूमिका निभा सकता है जितनी एक चमकीला, सक्रिय क्वासर।
भारत की भूमिका: डॉ. अरु बेरी और IIA
इस अंतरराष्ट्रीय शोध टीम में डॉ. अरु बेरी का शामिल होना भारतीय खगोल भौतिकी के लिए गर्व की बात है। वे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिज़िक्स (IIA) से जुड़ी हैं, जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है। यह दिखाता है कि भारतीय वैज्ञानिक अब सीमित संसाधनों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर की सबसे उन्नत रेडियो खगोल विज्ञान परियोजनाओं में सक्रिय योगदानकर्ता के रूप में शामिल हो रहे हैं, न कि केवल दर्शक के रूप में।
यह खोज क्यों मायने रखती है
यह अध्ययन आकाशगंगाओं के विकास को समझने के हमारे मॉडल में एक बड़ा अंतर भरता है। अब तक ज़्यादातर शोध चमकीले, अत्यधिक सक्रिय ब्लैक होल पर केंद्रित रहा है, क्योंकि वही देखने में आसान थे। लेकिन अगर लगभग एक-चौथाई आकाशगंगाओं में ऐसे "शांत" ब्लैक होल छिपे हैं जो लगातार ऊर्जा उत्सर्जित कर रहे हैं, तो आकाशगंगाओं के दीर्घकालिक विकास, तारा-निर्माण दर, और यहाँ तक कि ब्रह्मांड के बड़े पैमाने की संरचना को समझने वाले मॉडल को भी इस "छिपी हुई आबादी" को शामिल करके अपडेट करना होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
"शांत" या कमज़ोर रूप से सक्रिय ब्लैक होल का मतलब क्या है?
यह ऐसा सुपरमैसिव ब्लैक होल है जो बहुत धीमी गति से पदार्थ ग्रहण कर रहा है, जिससे वह क्वासर जैसे सक्रिय ब्लैक होल की तुलना में बेहद फीका और परंपरागत दूरबीनों के लिए लगभग अदृश्य रहता है।
इस खोज में कितनी आकाशगंगाओं का अध्ययन किया गया?
Palomar सैंपल से चुनी गई 280 आस-पास की आकाशगंगाओं का, जिनमें से लगभग एक-चौथाई में छिपे हुए ब्लैक होल के प्रमाण मिले।
e-MERLIN क्या है?
यह यूनाइटेड किंगडम में फैले सात रेडियो टेलीस्कोप का एक नेटवर्क है, जो आपस में जुड़कर एक बेहद उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले टेलीस्कोप की तरह काम करता है।
इस शोध में भारत की क्या भूमिका रही?
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिज़िक्स (IIA) की डॉ. अरु बेरी इस अंतरराष्ट्रीय शोध टीम का हिस्सा थीं।
निष्कर्ष में, ब्रह्मांड की सबसे रहस्यमयी वस्तुओं में से एक — सुपरमैसिव ब्लैक होल — के बारे में हमारी समझ अभी भी अधूरी है, और यह खोज साबित करती है कि सबसे "शांत" दिखने वाली चीज़ें भी अक्सर सबसे गहरा राज़ छुपाए रहती हैं। हर बार जब वैज्ञानिक थोड़ा और बारीकी से देखने का कोई नया तरीका खोजते हैं, ब्रह्मांड हमें अपनी एक और परत दिखा देता है।

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