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रक्षा प्रणालियों में सिस्टम इंजीनियरिंग | आधुनिक सैन्य तकनीक की अदृश्य रीढ़

 

रक्षा प्रणालियों में सिस्टम इंजीनियरिंग

जहाँ हथियार नहीं, बल्कि पूरा तंत्र युद्ध जीतता है

जब हम किसी मिसाइल, रडार या लड़ाकू विमान को देखते हैं, तो हमारी दृष्टि अक्सर उसके बाहरी स्वरूप या शक्ति पर टिक जाती है। लेकिन आधुनिक रक्षा प्रणालियों की असली शक्ति उस अदृश्य संरचना में छिपी होती है जो इन सभी घटकों को एक संगठित, विश्वसनीय और उद्देश्यपूर्ण प्रणाली में बदलती है। इसी संरचना को सिस्टम इंजीनियरिंग कहा जाता है।

रक्षा प्रणालियाँ आज इतनी जटिल हो चुकी हैं कि उन्हें केवल यांत्रिक या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के रूप में समझना अपर्याप्त है। वे बहु-विषयक (multi-disciplinary) प्रणालियाँ हैं — जिनमें भौतिकी, कंप्यूटिंग, मानव निर्णय, लॉजिस्टिक्स और रणनीति एक साथ कार्य करते हैं। सिस्टम इंजीनियरिंग इसी जटिलता को नियंत्रित करने का विज्ञान है।

अनुक्रमणिका
  • सिस्टम इंजीनियरिंग क्या है
  • रक्षा प्रणालियाँ क्यों अलग हैं
  • System of Systems की अवधारणा
  • विश्वसनीयता और विफलता प्रबंधन
  • मानव-मशीन एकीकरण
  • भारतीय रक्षा में सिस्टम इंजीनियरिंग
  • भविष्य की रक्षा प्रणालियाँ

सिस्टम इंजीनियरिंग क्या है?

सिस्टम इंजीनियरिंग केवल “डिज़ाइन प्रक्रिया” नहीं है। यह एक दार्शनिक और गणितीय दृष्टिकोण है, जिसमें किसी समस्या को उसके संपूर्ण जीवन-चक्र के साथ देखा जाता है — आवश्यकता से लेकर तैनाती और अंततः निष्कासन तक।

सरल शब्दों में, सिस्टम इंजीनियरिंग यह पूछती है: “क्या यह प्रणाली सही काम कर रही है?” से पहले — “क्या हम सही प्रणाली बना रहे हैं?” 


रक्षा के संदर्भ में यह प्रश्न अत्यंत गंभीर हो जाता है, क्योंकि यहाँ असफलता केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न होती है।

तथ्य: आधुनिक मिसाइल या एयर डिफेंस सिस्टम में 60–70% इंजीनियरिंग प्रयास सिस्टम इंटीग्रेशन और सत्यापन (verification) पर होता है, न कि केवल हार्डवेयर निर्माण पर।

रक्षा प्रणालियाँ क्यों अलग होती हैं?

एक सामान्य औद्योगिक प्रणाली विफल होने पर बदली जा सकती है। लेकिन रक्षा प्रणाली को अक्सर अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों में, बिना दूसरे अवसर के कार्य करना होता है।

रक्षा प्रणालियों की विशेषताएँ:

  • अत्यधिक जटिलता
  • रीयल-टाइम निर्णय
  • शत्रुतापूर्ण वातावरण
  • लंबा सेवा जीवन (20–40 वर्ष)

इसी कारण रक्षा सिस्टम इंजीनियरिंग में “अनिश्चितता के साथ डिज़ाइन” (designing under uncertainty) एक केंद्रीय सिद्धांत है।

विचार करें: यदि हर घटक 99% विश्वसनीय हो, तो क्या पूरी प्रणाली भी उतनी ही विश्वसनीय होगी?

System of Systems: युद्ध की असली संरचना

आधुनिक युद्ध में कोई भी हथियार अकेला नहीं लड़ता। एक मिसाइल तभी प्रभावी होती है जब उसे सेंसर डेटा, संचार नेटवर्क और कमांड सिस्टम से समर्थन मिले।

इसी को “System of Systems” कहा जाता है — जहाँ कई स्वतंत्र प्रणालियाँ मिलकर एक उच्च-स्तरीय क्षमता उत्पन्न करती हैं।

भारत का Integrated Air Command and Control System (IACCS) इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ रडार, फाइटर जेट, मिसाइल बैटरी और निर्णय केंद्र एक ही तंत्र में जुड़े होते हैं। 

एकीकृत कमांड सेंटर का उदाहरण

विश्वसनीयता, विफलता और Redundancy

रक्षा इंजीनियरिंग में यह स्वीकार किया जाता है कि हर घटक कभी न कभी विफल होगा। प्रश्न यह नहीं कि विफलता होगी या नहीं, बल्कि यह कि प्रणाली उस विफलता के बाद भी कार्य कर पाएगी या नहीं।

इसलिए रक्षा प्रणालियों में redundancy, fault tolerance और graceful degradation जैसे सिद्धांत अपनाए जाते हैं।

उदाहरण के लिए, भारतीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली IRNSS में कई स्तरों पर बैकअप सिस्टम मौजूद हैं।

तथ्य: सैन्य प्रणालियों में acceptable failure rate, नागरिक प्रणालियों की तुलना में 10–100 गुना कम होता है।

मानव-मशीन एकीकरण

सबसे उन्नत प्रणाली भी तब असफल हो सकती है, यदि मानव ऑपरेटर उसे सही ढंग से समझ न सके। इसलिए सिस्टम इंजीनियरिंग में मानव कारक (human factors) अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

फाइटर जेट का कॉकपिट, एयर डिफेंस कंट्रोल रूम या सबमरीन का नियंत्रण कक्ष — ये सभी मानव-मशीन इंटरफ़ेस के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

भारत के तेजस विमान में डिजिटल कॉकपिट और फ्लाई-बाय-वायर सिस्टम इसी दर्शन को दर्शाते हैं।

भारतीय रक्षा में सिस्टम इंजीनियरिंग

भारत की रक्षा यात्रा में सिस्टम इंजीनियरिंग की भूमिका धीरे-धीरे लेकिन स्थिर रूप से बढ़ी है। प्रारंभिक आयात-आधारित प्रणालियों से लेकर आज के स्वदेशी एकीकृत सिस्टम तक यह परिवर्तन स्पष्ट है।

DRDO, ISRO और निजी उद्योगों के बीच सहयोग ने एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाया है जहाँ सिस्टम-स्तरीय सोच को प्राथमिकता दी जा रही है।



यह आत्मनिर्भर भारत की रक्षा रीढ़ बनती जा रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या सिस्टम इंजीनियरिंग केवल बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए होती है?

नहीं, लेकिन रक्षा जैसे उच्च जोखिम क्षेत्रों में इसकी आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है।

भारत में सिस्टम इंजीनियरिंग क्यों महत्वपूर्ण है?

क्योंकि सीमित संसाधनों के साथ अधिकतम क्षमता निकालना भारत की रणनीतिक आवश्यकता है।

रक्षा प्रणालियों में सिस्टम इंजीनियरिंग केवल तकनीकी अनुशासन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक मानसिकता है। यह सोच सिखाती है कि शक्ति केवल हथियारों में नहीं, बल्कि उन्हें जोड़ने, समझने और नियंत्रित करने की क्षमता में निहित होती है।

आधुनिक भारत की रक्षा क्षमता इसी सोच पर निर्भर करेगी।

🛡️ रक्षा प्रौद्योगिकी श्रृंखला – आगे और पीछे

यह लेख भारत-केंद्रित रक्षा प्रौद्योगिकी श्रृंखला का हिस्सा है। नीचे दिए गए लेखों के माध्यम से पूरी श्रृंखला को क्रमबद्ध रूप में पढ़ें।

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