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आधुनिक युद्ध में विज्ञान की भूमिका

 

आधुनिक युद्ध में विज्ञान की भूमिका

जब युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि डेटा, एल्गोरिद्म और ऊर्जा से लड़ा जाता है

21वीं सदी का युद्ध अब केवल सैनिकों और बंदूकों के बीच की टक्कर नहीं रह गया है। यह युद्ध अब प्रयोगशालाओं, सैटेलाइट नियंत्रण कक्षों, सुपरकंप्यूटरों और कोड की पंक्तियों में लड़ा जाता है। आधुनिक युद्ध का स्वरूप इस बात का प्रमाण है कि विज्ञान अब सहायक नहीं, बल्कि युद्ध का केन्द्रीय स्तंभ बन चुका है।

भारत जैसे राष्ट्र के लिए, जिसकी भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या और सामरिक चुनौतियाँ अत्यंत जटिल हैं, विज्ञान आधारित रक्षा रणनीति केवल विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता है। आधुनिक युद्ध में विज्ञान की भूमिका को समझना, राष्ट्रीय सुरक्षा को समझने का ही एक और तरीका है।

अनुक्रमणिका
  • युद्ध की परिभाषा में वैज्ञानिक परिवर्तन
  • सूचना, सेंसर और डेटा का प्रभुत्व
  • भौतिकी: आधुनिक हथियारों की रीढ़
  • AI और एल्गोरिद्मिक युद्ध
  • अंतरिक्ष और साइबर डोमेन
  • भारत का वैज्ञानिक युद्ध दृष्टिकोण

युद्ध की परिभाषा में वैज्ञानिक परिवर्तन

इतिहास में युद्ध शक्ति और संख्या का खेल हुआ करता था। लेकिन जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ा, युद्ध का गणित बदलता गया। अब निर्णायक तत्व यह नहीं कि किसके पास अधिक सैनिक हैं, बल्कि यह है कि किसके पास अधिक सटीक जानकारी, तेज़ निर्णय प्रणाली और बेहतर तकनीकी एकीकरण है।

यह परिवर्तन “नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर” की अवधारणा में स्पष्ट दिखाई देता है, जहाँ हथियार, सैनिक, ड्रोन और कमांड सेंटर एक ही डिजिटल तंत्र से जुड़े होते हैं। यह तंत्र शुद्ध रूप से वैज्ञानिक सिद्धांतों — सूचना सिद्धांत, नियंत्रण प्रणाली और संचार भौतिकी — पर आधारित है।

तथ्य: आधुनिक युद्धों में 60% से अधिक निर्णायक बढ़त सूचना और सेंसर आधारित प्रणालियों से आती है, न कि प्रत्यक्ष हथियार टकराव से।

सूचना, सेंसर और डेटा का प्रभुत्व

आधुनिक युद्ध में “देख पाना” सबसे बड़ी शक्ति है। रडार, इंफ्रारेड सेंसर, सोनार और उपग्रह आधारित इमेजिंग — ये सभी विज्ञान की उपज हैं। भौतिकी के तरंग सिद्धांत, इलेक्ट्रोमैग्नेटिज़्म और सिग्नल प्रोसेसिंग के बिना ये प्रणालियाँ असंभव होतीं।

भारत ने इस क्षेत्र में स्वदेशी रडार प्रणालियों, AEW&C विमानों और ISR नेटवर्क के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति की है। यह केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता का संकेत है।

सोचिए: यदि किसी युद्ध में शत्रु दिखे ही नहीं, लेकिन वह हर गतिविधि जानता हो — तो असली शक्ति किसके पास है?

भौतिकी: आधुनिक हथियारों की रीढ़

मिसाइलों की गति, ड्रोन की स्थिरता, लेज़र हथियारों की ऊर्जा — सब कुछ भौतिकी के नियमों से नियंत्रित होता है। न्यूटन का यांत्रिकी, ऊष्मागतिकी और प्लाज़्मा भौतिकी आज के हथियार डिज़ाइन की नींव हैं।

भारत की अग्नि और ब्रह्मोस जैसी प्रणालियाँ केवल सामरिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक उपलब्धियाँ भी हैं। इनमें प्रयुक्त मार्गदर्शन प्रणाली, ईंधन रसायन और संरचनात्मक सामग्री उच्चस्तरीय विज्ञान का उदाहरण हैं।

AI और एल्गोरिद्मिक युद्ध

आधुनिक युद्ध में निर्णय की गति मानव क्षमता से आगे निकल चुकी है। यहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता निर्णायक भूमिका निभाती है — लक्ष्य पहचान, खतरे का अनुमान और प्रतिक्रिया योजना में।

भारत में AI आधारित निगरानी, स्वायत्त ड्रोन और निर्णय सहायता प्रणालियाँ विकसित की जा रही हैं। यह क्षेत्र केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और रणनीतिक प्रश्न भी खड़े करता है।

अंतरिक्ष और साइबर डोमेन

आधुनिक युद्ध का एक बड़ा हिस्सा धरती से ऊपर और कंप्यूटर नेटवर्क के भीतर लड़ा जाता है। उपग्रह संचार, GPS, और साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर अब युद्ध के नए मोर्चे हैं।

भारत की अंतरिक्ष क्षमताएँ और साइबर सुरक्षा रणनीतियाँ यह दर्शाती हैं कि विज्ञान आधारित युद्ध तैयारी अब बहु-डोमेन दृष्टिकोण अपनाए बिना अधूरी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या आधुनिक युद्ध पूरी तरह तकनीक पर निर्भर हो चुका है?

तकनीक निर्णायक है, लेकिन मानव निर्णय और रणनीतिक सोच अब भी केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।

भारत के लिए विज्ञान आधारित युद्ध क्यों आवश्यक है?

भौगोलिक चुनौतियों, सीमित संसाधनों और बहु-आयामी खतरों के कारण विज्ञान आधारित दक्षता भारत के लिए अनिवार्य है।

आधुनिक युद्ध में विज्ञान केवल उपकरण नहीं, बल्कि निर्णय की आत्मा बन चुका है। भारत के लिए यह समझना आवश्यक है कि राष्ट्रीय सुरक्षा अब प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों से भी आकार लेती है। विज्ञान जितना सशक्त होगा, राष्ट्र उतना ही सुरक्षित होगा।

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