रेडियोसॉन्ड : जब पृथ्वी आसमान से सवाल पूछती है
हर दिन हम मौसम की भविष्यवाणी सुनते हैं — आज बारिश होगी, तापमान बढ़ेगा, हवा तेज़ चलेगी।
लेकिन एक ईमानदार सवाल है: आख़िर मौसम की जानकारी आती कहाँ से है?
उपग्रह? हाँ। कंप्यूटर मॉडल? बिल्कुल। लेकिन इन सबकी नींव जिस एक उपकरण पर टिकी है, वह है — रेडियोसॉन्ड (Radiosonde)।
रेडियोसॉन्ड वह वैज्ञानिक संदेशवाहक है जो हर दिन चुपचाप गुब्बारे के साथ आसमान में जाता है और पृथ्वी को बताता है कि ऊपर क्या चल रहा है।
🌍 रेडियोसॉन्ड क्या है?
रेडियोसॉन्ड एक मौसम मापन उपकरण है जिसे एक बड़े हीलियम या हाइड्रोजन गुब्बारे के साथ ऊपरी वायुमंडल में छोड़ा जाता है।
यह उड़ान के दौरान लगातार मापता है:
- तापमान (Temperature)
- वायुदाब (Pressure)
- आर्द्रता (Humidity)
- हवा की दिशा और वेग (Wind)
और यह सारा डेटा रेडियो तरंगों के माध्यम से पृथ्वी पर स्थित रिसीविंग स्टेशन को भेजता रहता है।
🤔 ज़मीन से मौसम क्यों नहीं मापा जा सकता?
ज़मीन पर खड़े होकर हम केवल नीचे की हवा को महसूस करते हैं।
लेकिन मौसम की असली पटकथा ऊपर लिखी जाती है — ट्रोपोस्फियर और स्ट्रैटोस्फियर में।
बादल कहाँ बनेंगे? तूफ़ान क्यों पैदा होगा? मानसून कब सक्रिय होगा?
इन सभी सवालों के जवाब ऊर्ध्वाधर प्रोफाइल (Vertical Profile) में छिपे होते हैं।
रेडियोसॉन्ड वही प्रोफाइल बनाता है।
⚙️ रेडियोसॉन्ड की संरचना (Construction)
आकार में छोटा, लेकिन अंदर से अत्यंत वैज्ञानिक।
- तापमान सेंसर – थर्मिस्टर या थर्मोकपल
- दाब सेंसर – एनेरॉइड या सिलिकॉन प्रेशर सेल
- आर्द्रता सेंसर – हाइग्रोस्कोपिक पदार्थ आधारित
- रेडियो ट्रांसमीटर – डेटा भेजने के लिए
- बैटरी – ठंडे वातावरण में काम करने योग्य
- GPS यूनिट – हवा की गति और दिशा निकालने के लिए
इन सबको एक हल्के बॉक्स में पैक किया जाता है ताकि यह आसानी से ऊपर जा सके।
🔬 रेडियोसॉन्ड कैसे काम करता है? (Working)
रेडियोसॉन्ड की उड़ान एक वैज्ञानिक यात्रा है।
जैसे-जैसे गुब्बारा ऊपर उठता है:
- तापमान गिरता है
- दाब कम होता जाता है
- हवा की परतें बदलती हैं
रेडियोसॉन्ड इन परिवर्तनों को हर सेकंड मापता है।
डेटा → रेडियो सिग्नल → ग्राउंड स्टेशन
GPS से मिली स्थिति के आधार पर वैज्ञानिक हवा की गति और दिशा वेक्टर गणना से निकालते हैं।
यानी रेडियोसॉन्ड भौतिकी + गणित + संचार तकनीक का जीवंत उदाहरण है।
👩🔬 रेडियोसॉन्ड के पीछे वैज्ञानिक सोच
रेडियोसॉन्ड की अवधारणा 20वीं सदी की शुरुआत में विकसित हुई।
भारत में मौसम मापन उपकरणों को व्यवस्थित, सटीक और भरोसेमंद बनाने में डॉ. अन्ना मणि की भूमिका ऐतिहासिक रही।
उन्होंने रेडियोसॉन्ड और ओजोनसॉन्ड जैसे उपकरणों को भारतीय जलवायु के अनुरूप मानकीकृत किया।
👉 अन्ना मणि पर पूरा लेख यहाँ पढ़ें:
भारत के वैज्ञानिक रत्न : अन्ना मणि
🌦️ रेडियोसॉन्ड का महत्व (Importance)
- मौसम पूर्वानुमान की नींव
- मानसून मॉडलिंग
- चक्रवात और तूफ़ान चेतावनी
- विमानन सुरक्षा
- जलवायु परिवर्तन अध्ययन
- उपग्रह डेटा की पुष्टि
अगर रेडियोसॉन्ड न हो, तो मौसम मॉडल अंधे हो जाएँ।
📦 रोचक तथ्य (Facts Box)
- दुनिया भर में रोज़ 1000+ रेडियोसॉन्ड छोड़े जाते हैं
- एक उड़ान 2–3 घंटे चलती है
- ऊँचाई ~35 km तक
- अधिकांश रेडियोसॉन्ड वापस नहीं मिलते
- डेटा वैश्विक मौसम नेटवर्क में साझा होता है
✨ एक गुब्बारा, पूरी पृथ्वी
रेडियोसॉन्ड हमें यह सिखाता है कि विज्ञान हमेशा शोर नहीं मचाता।
कभी-कभी वह एक गुब्बारे के साथ आसमान में चुपचाप चला जाता है और पूरी पृथ्वी के भविष्य की जानकारी वापस भेज देता है।
STEM Hindi — जहाँ उपकरण भी कहानी सुनाते हैं।
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